हाँ, अब सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार “क्रीमी लेयर” की अवधारणा केवल OBC तक सीमित नहीं रही बल्कि SC और ST आरक्षण पर भी लागू होती है। इसका मतलब है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके SC/ST परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, ताकि वास्तव में पिछड़े वर्गों तक अवसर पहुँच सके।
पृष्ठभूमि और हालिया फैसले
Indra Sawhney केस (1992): पहली बार OBC में क्रीमी लेयर लागू की गई थी।
E.V. Chinnaiah केस (2006): कहा गया कि SC एक “homogeneous class” है, इसलिए उपवर्गीकरण संभव नहीं।
Davinder Singh केस (2024, 7-जज बेंच): इस पुराने फैसले को पलटते हुए कहा गया कि SC/ST में भी उपवर्गीकरण और क्रीमी लेयर लागू हो सकती है।
Jarnail Singh केस: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर SC/ST पर भी लागू होती है, ताकि आरक्षण का लाभ सबसे पिछड़े वर्गों तक पहुँचे।
क्रीमी लेयर का उद्देश्य
समानता का सिद्धांत (Article 14): अगर सामाजिक-आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके लोग आरक्षण लेते रहें तो वास्तव में पिछड़े वर्ग पीछे रह जाते हैं।
लाभ का पुनर्वितरण: आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक पहुँचे जो अभी भी शिक्षा, नौकरी और सामाजिक स्थिति में पिछड़े हैं।
आर्थिक सीमा: OBC के लिए वर्तमान सीमा ₹8 लाख वार्षिक आय है। SC/ST के लिए भी इसी तरह की सीमा लागू करने पर चर्चा चल रही है।
विवाद और चुनौतियाँ
SC/ST समुदायों में विरोध: कुछ लोग मानते हैं कि सामाजिक भेदभाव अभी भी इतना गहरा है कि आर्थिक स्थिति से फर्क नहीं पड़ता।
नीतिगत अस्पष्टता: राज्यों और केंद्र सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने होंगे कि SC/ST में क्रीमी लेयर कैसे तय होगी।
संवैधानिक बहस: क्या यह कदम सामाजिक न्याय को मजबूत करेगा या कमजोर?
सारांश
पहले केवल OBC में लागू था, अब SC/ST में भी लागू है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल वास्तव में पिछड़े वर्गों को मिलना चाहिए।
नीति निर्धारण अभी राज्यों और केंद्र सरकार पर निर्भर करेगा।
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